
Year - 7 Month - October 2026 Issue - 81
मेरे प्यारे विद्यार्थियों और भविष्य के कर्णधारों,
आज मैं आपके सामने कोई भारी-भरकम उपदेश देने नहीं आया हूँ। मैं आपसे एक दोस्त की तरह बात करना चाहता हूँ, क्योंकि जो बातें मैं कहने जा रहा हूँ, वे हर उस इंसान के दिल की बातें हैं जिसने कभी कोई सपना देखा है।
एक छोटा-सा सवाल
मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। क्या आपने कभी रात को सोने से पहले छत की ओर देखकर सोचा है कि "मैं बड़ा होकर क्या बनूँगा?" क्या कभी आपके मन में यह ख्याल आया कि "काश, मैं भी कुछ ऐसा कर पाता जिस पर मेरे माता-पिता को गर्व हो?"
अगर हाँ, तो बधाई हो! आप जीवित हैं, आपके भीतर आग है, और आप में कुछ कर गुज़रने की ताकत है। सपने देखना ही सफलता की पहली सीढ़ी है।
पर याद रखिए, केवल सपने देखना काफी नहीं है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने वो नहीं जो आप नींद में देखते हैं, सपने वो हैं जो आपको सोने नहीं देते। और यही बात आज मैं आपके दिल में उतारना चाहता हूँ।
शुरुआत हमेशा छोटी होती है
दोस्तो, हर बड़ी इमारत की नींव में एक छोटी-सी ईंट होती है। हर बड़ी नदी किसी पहाड़ की एक छोटी-सी बूँद से शुरू होती है। हर महान व्यक्ति कभी एक साधारण विद्यार्थी था।
अब्दुल कलाम का बचपन रामेश्वरम की गलियों में अख़बार बाँटते हुए बीता। वे एक ऐसे परिवार से थे जहाँ पैसों की तंगी थी। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी, जिज्ञासा और सीखने की भूख। वही लड़का आगे चलकर भारत का "मिसाइल मैन" बना और देश का राष्ट्रपति बना।
हमारे आसपास ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। कोई गाँव के सरकारी स्कूल से पढ़कर आई.ए.एस. अफसर बना, किसी ने लालटेन की रोशनी में पढ़कर डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया, किसी ने साधारण परिवार से निकलकर खेल के मैदान पर तिरंगा लहराया।
तो आप यह कभी मत सोचिए कि "मेरे पास तो साधन नहीं हैं", "मैं तो छोटे शहर से हूँ", या "मेरे पास तो अच्छे स्कूल की सुविधा नहीं है।" साधन आपको रास्ता दिखा सकते हैं, पर मंज़िल तक पैर आपके अपने ही चलते हैं।
असफलता अंत नहीं है
अब मैं एक ऐसी बात करना चाहता हूँ जिससे हम में से बहुत से लोग डरते हैं, और वह है असफलता।
परीक्षा में कम नंबर आ गए, तो लगता है जैसे दुनिया खत्म हो गई। किसी प्रतियोगिता में हार गए, तो लगता है अब कुछ नहीं हो सकता। दोस्तो, यह सोच बिल्कुल गलत है।
थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने की कोशिश में हज़ारों बार असफलता पाई। जब किसी ने उनसे पूछा कि आप इतनी बार असफल हुए, तो निराश क्यों नहीं हुए? उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "मैं असफल नहीं हुआ, मैंने तो बस हज़ारों ऐसे तरीके खोज लिए जो काम नहीं करते।"
सोचिए, अगर एडिसन पहली या दसवीं असफलता पर हार मान लेते, तो आज हमारी रातें अँधेरे में होतीं।
असफलता हमारी दुश्मन नहीं, हमारी सबसे बड़ी शिक्षक है। वह हमें बताती है कि कहाँ कमी रह गई, किस जगह और कितनी मेहनत की ज़रूरत है। जो गिरकर उठना सीख लेता है, वही असली विजेता बनता है।
एक बच्चा जब चलना सीखता है, तो कितनी बार गिरता है? लेकिन क्या वह कभी कहता है कि "मुझसे नहीं होगा"? नहीं! वह उठता है, फिर गिरता है, फिर उठता है, और एक दिन दौड़ने लगता है। हम सब के भीतर वही बच्चा आज भी जीवित है। बस हमें उसे फिर से जगाना है।
मेहनत का कोई विकल्प नहीं
मेरे प्यारे विद्यार्थियो, इस दुनिया में कोई जादू की छड़ी नहीं होती जो आपको रातोंरात सफल बना दे। अगर कोई ऐसा दावा करे, तो समझ जाइए कि वह झूठ बोल रहा है।
सफलता का एक ही रास्ता है, और वह है लगातार मेहनत। एक किसान को देखिए। वह बीज बोता है, फिर महीनों तक खेत में पसीना बहाता है, पानी देता है, रखवाली करता है। तब जाकर फसल लहलहाती है। अगर वह आज बीज बोकर कल ही फसल माँगे, तो क्या मिलेगा?
पढ़ाई भी ठीक ऐसी ही है। आज आप जो पाठ पढ़ रहे हैं, जो सवाल हल कर रहे हैं, वे सब बीज हैं। उनका फल शायद आज न दिखे, पर एक दिन ज़रूर दिखेगा।
और मेहनत का मतलब केवल घंटों किताबों में डूबे रहना नहीं है। मेहनत का मतलब है स्मार्ट तरीके से, नियमित रूप से और पूरी लगन के साथ काम करना। रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ना, रोज़ थोड़ा-थोड़ा सुधरना। यही छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़ी सफलता बनती हैं।
याद रखिए, कल की चिंता में आज को मत खोइए। जो काम आज करना है, आज ही कीजिए। "कल से पक्का शुरू करूँगा" वाला वह कल कभी नहीं आता।
समय की कीमत पहचानिए
समय दुनिया की सबसे कीमती चीज़ है, और सबसे अजीब बात यह है कि यह सबको बराबर मिलता है। चाहे अंबानी हो या आम इंसान, दिन में सबको चौबीस घंटे ही मिलते हैं। फर्क इस बात का है कि कौन उन्हें कैसे इस्तेमाल करता है।
आज के दौर में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है मोबाइल और सोशल मीडिया। मैं यह नहीं कहता कि तकनीक बुरी है। तकनीक एक अद्भुत वरदान है। इसी से हम दुनिया भर का ज्ञान अपनी उँगलियों पर पा सकते हैं। पर जब यह हमारा समय निगलने लगे, जब घंटों बेमतलब की रील्स देखते हुए बीत जाएँ, तब यह वरदान नहीं, एक जाल बन जाता है।
अपने आप से पूछिए: "आज मैंने ऐसा क्या किया जो मुझे कल से बेहतर बनाता है?" अगर इसका जवाब रोज़ "हाँ" है, तो आप सही रास्ते पर हैं।
सही संगति, सही सोच
कहा जाता है कि इंसान अपनी संगति से पहचाना जाता है। आप जिन लोगों के साथ समय बिताते हैं, वे धीरे-धीरे आपकी सोच, आपकी आदतों और आपके भविष्य को गढ़ते हैं।
ऐसे दोस्त बनाइए जो आपको ऊपर उठाएँ, जो आपकी सफलता पर खुश हों और आपकी गलती पर आपको सही राह दिखाएँ। और खुद भी किसी के लिए ऐसा ही दोस्त बनिए।
साथ ही, अपनी सोच को सकारात्मक रखिए। आपका मन एक बगीचे जैसा है। अगर आप उसमें नकारात्मक विचारों के काँटे बोएँगे, तो वही उगेंगे। और अगर आत्मविश्वास, उम्मीद और हिम्मत के फूल बोएँगे, तो जीवन महक उठेगा।
अपने आप से कभी यह मत कहिए कि "मैं नहीं कर सकता।" इसकी जगह कहिए, "मैं कोशिश करूँगा, और मैं सीखूँगा।" शब्दों में बड़ी ताकत होती है, और सबसे ज़्यादा ताकत उन शब्दों में होती है जो हम खुद से कहते हैं।
तुलना मत कीजिए, खुद से मुकाबला कीजिए
आज के विद्यार्थियों की एक बड़ी परेशानी है दूसरों से तुलना करना। "उसके नंबर मुझसे ज़्यादा क्यों आए?" "वह मुझसे आगे क्यों निकल गया?"
बच्चों, हर फूल का अपना रंग होता है, अपनी खुशबू होती है। गुलाब कमल से तुलना नहीं करता, और कमल गुलाब से जलता नहीं। दोनों अपनी-अपनी जगह सुंदर हैं।
आपकी यात्रा आपकी अपनी है। किसी की रफ़्तार तेज़ हो सकती है, किसी की धीमी, पर हर किसी की मंज़िल और समय अलग है। इसलिए दूसरों को देखकर खुद को कम मत आँकिए।
अगर तुलना करनी ही है, तो खुद से कीजिए। कल आप जैसे थे, आज उससे थोड़ा बेहतर बनिए। बस इतना काफी है। यही असली प्रगति है।
अपनों का साथ और अपने मन की सुनिए
मेरे प्यारे बच्चों, कभी-कभी रास्ता कठिन लगेगा। परीक्षा का दबाव होगा, भविष्य की चिंता होगी, और ऐसे पल भी आएँगे जब मन थककर बैठ जाना चाहेगा। यह बिल्कुल स्वाभाविक है। यह कमज़ोरी नहीं, इंसान होने की निशानी है।
ऐसे समय में अकेले मत जूझिए। अपने माता-पिता से बात कीजिए, अपने शिक्षकों से मिलिए, अपने भरोसेमंद दोस्तों को अपने मन की बात बताइए। मदद माँगना हार नहीं है, यह समझदारी है। याद रखिए, आपके माता-पिता ने आपके लिए अपने कितने सपने कुर्बान किए हैं। उनके लिए आपकी खुशी और आपका स्वस्थ रहना किसी भी नंबर या रैंक से कहीं ज़्यादा कीमती है।
अपने शरीर और मन का भी ख्याल रखिए। समय पर सोइए, पौष्टिक खाना खाइए, थोड़ा खेलिए, थोड़ा टहलिए, और जो पसंद है वह शौक भी निभाइए। एक स्वस्थ शरीर और शांत मन ही अच्छी पढ़ाई की नींव है।
ज़िम्मेदारी और संस्कार
सफलता का मतलब केवल ऊँची नौकरी या बड़ा नाम नहीं है। असली सफलता तब है जब आप एक अच्छे इंसान भी बनें।
अपने बड़ों का सम्मान कीजिए, अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञ रहिए, और कमज़ोरों की मदद कीजिए। ईमानदारी, सच्चाई और दया कभी मत छोड़िए। डिग्रियाँ हमें रोज़गार दे सकती हैं, पर संस्कार हमें इंसान बनाते हैं।
हमारा देश भारत युवाओं का देश है। आप ही इसका कल हैं। कल कोई डॉक्टर बनकर लोगों की जान बचाएगा, कोई इंजीनियर बनकर पुल और शहर बनाएगा, कोई शिक्षक बनकर नई पीढ़ी गढ़ेगा, कोई किसान बनकर देश का पेट भरेगा, कोई वैज्ञानिक बनकर चाँद-सितारों तक पहुँचेगा। हर भूमिका महत्वपूर्ण है, और हर भूमिका में आपकी ईमानदार मेहनत देश को आगे ले जाएगी।
अंत में, एक वादा
प्रिय विद्यार्थियो, अब मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ, पर उससे पहले आपसे एक वादा चाहता हूँ। आज अपने आप से एक वादा कीजिए।
वादा कीजिए कि आप हार नहीं मानेंगे।
वादा कीजिए कि आप रोज़ थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करेंगे।
वादा कीजिए कि आप अपने सपनों पर विश्वास रखेंगे, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।
और वादा कीजिए कि आप अपने माता-पिता, अपने गुरुओं और अपने देश का नाम रोशन करेंगे।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था: "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
यह वाक्य सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है, पर आज भी उतना ही ताज़ा है, क्योंकि यह हर उस इंसान के लिए है जो कुछ बनना चाहता है।
आपके पास पंख हैं, बस आसमान को देखने की हिम्मत चाहिए। आपके पास पैर हैं, बस पहला कदम उठाने का साहस चाहिए। और आपके पास दिल है, जिसमें अनंत संभावनाएँ भरी हैं।
तो आज से, अभी से, इसी पल से शुरुआत कीजिए। क्योंकि जो आज बोया जाएगा, वही कल लहलहाएगा।
मेरी ओर से आप सभी को ढेरों शुभकामनाएँ। आप जहाँ भी जाएँ, जो भी करें, पूरे दिल से करें और पूरी ईमानदारी से करें। सफलता खुद आपके कदम चूमेगी।
आप सभी उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ें, यही शुभकामनाएँ।
जय हिंद! जय भारत!
अगले महीने कुछ और लेकर आपके सामने फिर आऊंगा।
आपका पथ-प्रदर्शक
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धर्मेन्द्र कुमार
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