💬Thought for the Day💬

"🍃🌾🌾 "Your competitors can copy your Work, Style & Procedure. But No one can copy your Passion, Sincerity & Honesty. If you hold on to them firmly, The world is yours..!! Follow your Principles." 🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃💫🍃

Prayas - December 2022

                                                            

Year - 2                          Month - December 2022                        Issue - 37

प्यारे बच्चों,

धीरे-धीरे हमलोग वर्ष के अंतिम माह में आ गए अगले महीने में इस वर्ष का लेखा -जोखा लिखेंगे 

 एक वीरान इलाक़े से छोटे पहलवान गुज़र रहा था। अचानक चार लठैतों ने घेर लिया।

"जो कुछ है निकाल दे... जल्दी!"

छोटे ने कहना नहीं माना, बस होने लगा घमासान। धुँआधार झगड़ा हुआ। पहलवान आकाश पाताल एक करवाने के बाद ही क़ाबू में आया। छोटे ने अपनी अंटी कसके मुट्ठी में दबा रखी थी, जो खुलने का नाम ही नहीं ले रही थी। आख़िर जैसे-तैसे अंटी खुली और अंटी से निकली सिर्फ़ एक चवन्नी!

"एक चवन्नी ? वो भी सरकार ने अब बन्द कर दी है !" एक बोला।

"इतनी कोशिश करके तो ओलम्पिक में मैडल मिल जाता...और ये चवन्नी के पीछे लड़ रहा था ?" -दूसरा बोला।

चारों डक़ैत और छोटे पहलवान थक कर पस्त हो चुके थे।

"यार बीड़ी ही निकाल लो" एक डक़ैत बोला।

छोटे पहलवान ने बड़े सम्मान के साथ जेब से बीड़ी निकाल कर पेश की। अब सीन बदल चुका था...सबकी आपस में जान पहचान हो जाने पर एक डक़ैत ने पूछा-

"तुम्हारे पास सिर्फ़ एक चवन्नी थी और तुम इतनी भयानक लड़ाई लड़ रहे थे?"

इस पर छोटे ने अपने जूते में छुपाया हुआ हज़ार का नोट निकाल कर दिखाया

"ये देखो!"

"अरे! तुमको डर नहीं लग रहा कि हम तुमसे ये नोट छीन लेंगे?

"सवाल ही नहीं उठता!" छोटे ने विश्वास के साथ कहा।

"क्यों ?"

"देखो गुरु! तुम समझ गये हो कि जब मैं चवन्नी के लिए तुम चारों से इतना भीषण युद्ध कर सकता हूँ, तो फिर हज़ार रुपये के लिए तो पूरी बटालियन से लड़ जाऊँगा। इसलिए तुमको नोट दिखाने में कोई समस्या नहीं है।"

        छोटे पहलवान का लक्ष्य था अपनी अंटी की सुरक्षा करना। इससे कोई मतलब नहीं था कि अंटी में चवन्नी है या हज़ार रुपए और इस लक्ष्य के लिए उसने भीषण लड़ाई लड़ी। इस बार मैंने 'लक्ष्य' और 'साधना' पर कुछ लिखने की कोशिश की है...

        स्वामी विवेकानंद अक्सर देश-विदेश के दौरे पर रहते थे। जगह-जगह पर उनके भाषण हुआ करते थे। 14-15 वर्ष की कच्ची उम्र के नरेन (विवेकानंद का बचपन का नाम) पर, 1876-78 के समय भारत में पड़े भीषण अकाल का गहरा असर पड़ा। बाद में भी वर्षों तक अकाल की विभीषिका भारत में अपनी काली छाया से बर्बादी करती रही। विवेकानंद अकाल के समय ध्यान और प्रवचन छोड़ कर अकालग्रस्त लोगों की सहायता करने में लग जाते थे और दिन-रात उसमें लगे रहते थे। एक बार, उनके सम्पर्क के लोगों को एतराज़ हुआ, जिनमें से कुछ संन्यासी भी थे। वो चार-पांच लोग उनके पास आये और उनमें से एक नौजवान संन्यासी ने उनसे कहा-

"ये आप क्या कर रहे हैं ? स्वामी जी ! ना तो ये आपका लक्ष्य है और ना ही आपका कार्य। आपका लक्ष्य है भारत की संस्कृति से सम्बन्धित प्रवचन देना। सारे देश-दुनिया में उसे फैलाना और लोगों को जागृत करना। आपने तो ध्यान करना भी बंद कर दिया है।"

"अच्छा ठीक है... आज ध्यान ही करते हैं... तुम सही कह रहो हो, ध्यान करना आवश्यक है।" विवेकानन्द जी ने कहा

जब सब ध्यानमग्न हो गए तो स्वामी जी ने एक पास में रखा हुआ डंडा उठाया और एक डंडा उस नौजवान संन्यासी की पीठ पर मारा, जब उसने आँखें खोली तो दो-तीन डण्डे और जमा दिए। वह एकदम उत्तेजित और परेशान हो गया। उसके साथ में जो तीन-चार लोग थे, वह भी एकदम से चौंक गए। वो खड़े हुए और कहने लगे-

"ये आप क्या रहे हैं ? आपने इस तरह से क्यों पीटना शुरू कर दिया ?"

इस पर स्वामी विवेकानंद ने कहा-

"क्या इन परिस्थिति में तुम ध्यान कर सकते हो ? जब मैंने डंडा उठाया तो तुम डंडे से ख़ुद को बचाने में लग गये। ठीक यही स्थिति मेरी है। जब मेरे देश में अकाल पड़ा हुआ है, लोग भूखो मर रहे हैं, यहाँ तक कि ग़रीब स्त्रियों ने अपने बच्चे बेच दिए, लोग भूख की वजह से अपने हाथ खा गये और तुम चाहते हो कि मैं अकाल राहत कार्य छोड़ कर ध्यान, योग और संस्कृति की बातें करूँ ? इस समय मेरा लक्ष्य, लोगों को अकाल से बचाना है और यही है सच्ची 'साधना'"

अपनी इन विलक्षणताओं के कारण ही स्वामी विवेकानन्द को आज सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।

        साधक, साधना और साध्य; इन तीनों में क्या महत्त्वपूर्ण है ? लक्ष्य क्या होना चाहिए ? फल की इच्छा न करने के लिए गीता में क्यों लिखा है ?

साध्य वह लक्ष्य है, जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं। साधना उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जो कुछ आप कर रहे हैं, वो है। आपके क्रियान्वयन हैं, आपके प्रयास हैं और साधक, साधक आप हैं। क्या महत्त्वपूर्ण है इन तीनों में? हमेशा यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि सबसे महत्त्वपूर्ण साधना होती है। लक्ष्य महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण आप भी नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण है वह साधना। इस साधना के बल पर ही, आप कुछ रचना कर सकते हैं, कुछ ख़ास बन सकते हैं, महत्त्वपूर्ण बन सकते हैं। इसे समझा कैसे जाए?

एक कहावत है "या तो कुछ ऐसा करो कि लोग उस पर लिखें, या कुछ ऐसा लिखो कि लोग उसे पढ़ें"

Blockquote-open.gif जब सब ध्यानमग्न हो गए तो स्वामी जी ने एक पास में रखा हुआ डंडा उठाया और एक डंडा उस नौजवान संन्यासी की पीठ पर मारा, जब उसने आँखें खोली तो दो-तीन डण्डे और जमा दिए। Blockquote-close.gif

        वास्तविक लक्ष्य क्या होता है ? सचिन तेंदुलकर जब खेलने जाते हैं, तो क्या लक्ष्य होता है ? बढ़िया खेलना, देश को जिताना या 100-200 रन बनाना ? यदि देश को जिताना लक्ष्य होता है, तो ध्यान खेल में नहीं लग सकता, 100 रन बनाने का लक्ष्य रहे, तब भी ध्यान खेल में नहीं लगेगा, खेल पर ध्यान देने के लिए तो एकाग्रता से उस गेंद को देखना होता है, जो गेंदबाज़ के हाथ से छूटती है और सचिन के बल्ले तक आती है। गड़बड़ी कहाँ होती है ? जब रनों की संख्या 90 से ऊपर पहुँचती है। इस स्थिति में लक्ष्य 100 रन बनाने का हो जाता है और खेल से ध्यान हट जाता है, फिर गेंद नहीं स्कोर-बोर्ड दिमाग़ में ऊधम मचाने लगता है। इस 90 और 100 के बीच आउट होने की संभावना बढ़ जाती है।

गीता का एक श्लोक है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

इस श्लोक का सीधा-सादा सा अर्थ है कि आपका लक्ष्य 'कर्म' होना चाहिए 'फल' नहीं।

        महाभारत के एक प्रसंग से हम सभी परिचित हैं, जिसमें द्रोणाचार्य ने एक चिड़िया, एक पक्षी की आँख भेदने के लिए सब पाण्डवों और कौरवों को बुलाया था। दूसरे राजकुमारों से भिन्न, अर्जुन ने कहा-

"मेरा ध्यान तो सिर्फ़ चिड़िया की आँख पर है और मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा।"

उस समय भी राजकुमारों को किसी परीक्षा में खरा उतरने के लिए पुरस्कृत किया जाता होगा। अर्जुन का ध्यान यदि परीक्षा की सफलता या उस पुरस्कार पर होता तो क्या निशाना सही लगता ? कोई आवश्यक नहीं है कि निशाना सही ही लगता।

अर्जुन का लक्ष्य था सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनना, इसलिए उसे चिड़िया की आँख ही दिखाई दे रही थी। यह सब घटा किस तरह होगा ? अर्जुन ने पूरी प्रक्रिया की... उसने अपने धनुष को उठाया होगा, फिर तूणीर में से एक बाण निकाला होगा, फिर धनुष पर रखा होगा, प्रत्यंचा खींची होगी, फिर लक्ष्य की ओर ध्यान दिया होगा, और तब बाण चलाया होगा। और उसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसने यह सब करने के लिए कितना अधिक अभ्यास किया होगा। इसके पीछे कितनी साधना छिपी हुई थी। केवल चिड़िया की आँख देखने से ही निशाना नहीं लग जाता बल्कि सही बात यह है कि अर्जुन ने बाण से लक्ष्य-भेद का इतना अधिक अभ्यास कर लिया था कि वह निशाना लगाते समय केवल लक्ष्य को ही देखता था।

        इसी में एक प्रसंग और आता है कि अर्जुन ने एक बार रात में खाना खाते हुए ये सोचा-

"अभ्यासवश जब मैं बिना देखे रात में खाना खा रहा हूँ। खाना खाना मेरे अभ्यास में है, इसलिए मैं बिना देखे ही थाली में से भोजन को हाथ से उठाता हूँ और मुँह तक ले जाता हूँ। कभी ऐसा नहीं होता कि भोजन आँख में, कान में या नाक में चला जाए, तो उसने सोचा कि रात में तीर चलाने का अभ्यास भी किया जा सकता है। इसलिए धनुष पर तीर रखने तक की प्रक्रिया के लिए अर्जुन को लक्ष्य से ध्यान हटाकर धनुष और बाण की ओर देखने की भी आवश्यकता नहीं थी।

        आपका लक्ष्य क्या है, यह सबसे महत्त्वपूर्ण है। यदि आप युद्ध में हैं, तो लक्ष्य दूसरे को हराना नहीं बल्कि ख़ुद जीतना होना चाहिए। यदि आपका लक्ष्य दूसरे को हारते हुए देखना है, तो आप योद्धा नहीं, एक साधारण से व्यक्ति हैं जो कि बदला लेना चाहता है। यदि ख़ुद को जीतते हुए देखना, आपका लक्ष्य है तो आप सचमुच योद्धा हैं और इतिहास आपको याद रखेगा। अब इसे ऐसे देखें-

        महात्मा गांधी और सरदार भगत सिंह का एक ही लक्ष्य था, लेकिन तरीक़े अलग थे। क्या था ये लक्ष्य ? अंग्रेज़ों को भारत से भगाना ? नहीं ऐसा नहीं था। उनका लक्ष्य था, भारत को आज़ाद कराना... स्वतंत्रता। इन दोनों बातों में बड़ा फ़र्क़ है। एक सकारात्मक है और एक नकारात्मक। अंग्रेज़ों को भगाना नकारात्मक है और स्वतंत्रता पाना सकारात्मक। लक्ष्य वही है जो सकारात्मक हो। छात्र जीवन में इस प्रकार की बातें अक्सर हमारे सामने आती हैं। कुछ छात्र लक्ष्य बनाते हैं पास होने का, कुछ बनाते हैं बहुत अच्छे अंक लाने का और जो सर्वश्रेष्ठ होते हैं उनका लक्ष्य होता है 'ज्ञानार्जन'।

        सिर्फ़ डिग्रियों से नौकरी मिलने का ज़माना अब ख़त्म हो रहा है। आज स्थितियाँ ये हो गई हैं कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने डिग्रियाँ देखना बन्द कर दिया है। वो उस फ़ाइल को उठाकर भी नहीं देखते जो आप इंटरव्यू में अपने साथ ले जाते हैं। वो सिर्फ़ आपसे बात करते हैं और कुछ दिन आपको कुछ काम या कोई प्रोजेक्ट दे देते हैं, जो आपको पूरा करके लाना होता है। इससे आपकी योग्यता की पहचान हो जाती है और नौकरी मिल जाती है। ये तभी सम्भव है, जब आपकी साधना पूरी रही हो, आपने पढ़ाई अच्छे ढंग से की हो। जो पढ़ाई केवल नम्बर लाने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद की योग्यता और जानकारी बढ़ाने के लिए की गई हो।

इस माह इतना ही... अगले माह कुछ और…

आने वाले नव वर्ष की शुभकामनाएं।

धन्यवाद

आपका पथ-प्रदर्शक 

धर्मेन्द्र कुमार  

prayas - November 2022

                                                                  

Year - 2                          Month - November 2022                        Issue - 36

प्यारे बच्चों,

प्रकृति कहिए या ईश्वर कहिए, उसने पृथ्वी पर जो कुछ भी पैदा किया उसमें एक उल्लास पूर्ण गति अवश्य दी। मनहूस उदासी या आडम्बरी गंभीरता किसी भी जीव में नहीं दी। यहाँ तक कि वनस्पति में भी एक उल्लास से भरी हुई विकास की गति होती है। सूरजमुखी का फूल सूर्य को ही तकता रहता है और सूर्य जिस दिशा में जाता है उसी दिशा में वह मुड़ जाता है। फूलों की बेल, सहारे तलाश करती रहती हैं और जैसे अपनी बाहें फैलाकर सहारे को पकड़ ऊपर बढ़ती जाती हैं।

 

आप सड़क से एक पिल्ला उठा लाइये। सारा दिन घर में धमा-चौकड़ी मचाए रहेगा। कहने का सीधा अर्थ यह है जिसे हम सभी जानते ही हैं कि जीवन का अर्थ ही उत्सव और उल्लास है। प्रत्येक मनुष्य का प्रत्येक बच्चा जन्म से ही नृत्य, गायन, वादन, चित्रकारी, मूर्तिकारी, खेल जैसी आदि प्रतिभाओं से परिपूर्ण होता है। जिज्ञासा से भरा खोजी स्वभाव प्रत्येक बच्चे का स्वाभाविक गुण होता है। यह स्थिति मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों में भी होती है। मैंने बड़े क़रीब से देखा है ऐसे बच्चों को जिनकी मानसिक क्षमता हटकर होती हैं और जिन्हें हम मानसिक रूप से अविकसित या विशिष्ट रूप से विकसित मानते हैं। इन बच्चों में भी प्रसन्नता और उल्लास का भाव भरपूर होता है।

 

समस्या तब शुरु होती है जब धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होने लगता है तो अधिकतर माता-पिता (या अन्य अभिभावक) उसकी इन प्रतिभाओं को बड़े गर्व के साथ समाप्त करने में लग जाते हैं। इसमें स्कूल भी अपनी भूमिका बख़ूबी निबाहता है। अधिकतर स्कूलों में शिक्षा जिस तरीक़े से दी जा रही है वह बेहद शोचनीय अवस्था है। पढ़ाई में सृजनात्मकता जैसा कुछ भी नहीं होता। उन्हें वह नहीं सिखाया जाता जोकि उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होगा और वे स्वयं अपनी सफलता का रास्ता चुन सकेंगे बल्कि उनको एक पारंपरिक तरीक़े की पढ़ाई दी जाती है जिससे वे कुछ नया करने की बजाय ख़ुद को किसी न किसी जॉब के लायक़ बनाने में लग जाते हैं।

 

महान विचारक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा भी है कि स्कूलों में बच्चों को ‘क्या सोचा जाय सिखाने की बजाय कैसे सोचा जाय’ यह सिखाना चाहिए। इस आउटडेटेड उबाऊ शिक्षा पद्धिति के कारण बच्चों के भीतर की उमंग और उल्लास ख़त्म होने लगता है। ओढ़ी हुई गंभीरता मनहूसियत भरी उदासी उनका स्थाई स्वभाव बन जाता है। बच्चों को यह मौक़ा ही नहीं दिया जाता वे जान सकें कि उनमें कौन सी विशेष प्रतिभा है। बच्चों की मार्कशीट ही उनकी योग्यता की पहचान बन जाती है।

 

ज़रा बताइये कि मैंने कॅलकुलस, ट्रिगनोमॅट्री, वेक्टर, प्रॉबेबिलिटी आदि की पढ़ाई की… वह मेरे किस काम आ रही है… किसी काम नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि गणित मेरा पसंदीदा विषय था लेकिन मुझे उन विषयों या क्षेत्रों को छेड़ने का मौक़ा ही नहीं मिला जो मेरे प्रिय हो सकते थे या उनमें से कोई एक मेरा पॅशन बन सकता था।

 

व्यवसाय में पिता अपने वारिस को सिखाता है कि बेटा-बेटी जितनी ज़्यादा मनहूसियत भरी गंभीरता तुम ओढ़े रहोगे तुमको उतना ही बड़ा बिजनेसमॅन समझा जाएगा। सरकारी कार्यालय में चले जाएँ तो ऐसा लगता है कि यहाँ अगर ज़ोर से हँस पड़े तो शायद छत ही गिर पड़ेगी क्योंकि उस छत ने कभी हंसी की आवाज़ सुनी ही नहीं (सुबह-सुबह सफ़ाई कर्मचारी ही शायद हँसते हों)। आलम ये है कि ओढ़ी हुई गंभीरता एक संस्कृति बन चुकी है। अब न तो इस मनहूस संस्कृति को क्या नाम दिया जाय यह समझ में आता और इसको ख़त्म करने का उपाय ही।

 

एक सामान्य शिष्टाचार है कि किसी अजनबी से आपकी नज़र मिल जाय तो हल्का सा मुस्कुरा दें। यह शिष्टाचार यूरोपीय देशों में बहुत आम है। हमारे देश में यदि आप किसी अजनबी को देखकर मुस्कुरा गए और यदि वो लड़की हुई तो सोचेगी कि आप उसे छेड़ रहे हैं और यदि कोई लड़की किसी अजनबी लड़के को देखकर मुस्कुरा गई तो लड़का समझेगा कि यह प्रेम का निमंत्रण है।

 

क्या आपको नहीं लगता कि ये सब बातें स्कूल में सिखाई जानी चाहिए? मेरी आज तक यह समझ में नहीं आया कि स्कूल में बच्चों को घर का काम करना क्यों नहीं सिखाया जाता। जैसे; चाय-बिस्किट-नाश्ता बनाना, कपड़े तह करना, कपड़े इस्तरी करना, शारीरिक सफ़ाई, माता-पिता से व्यवहार, कील-चोबे लगाना, कपड़ों में बटन लगाना, छोटे बच्चे की देख-भाल करना, बाग़वानी, आदि-आदि। इसके अलावा ‘डू इट योरसेल्फ़’ की बहुत सी चीज़ें सिखाई जानी चाहिए, ज़रूरतमंद लोगों की मदद क्यों, कब और कैसे करें यह उनके स्वभाव में आना चाहिए। यह सब लड़की-लड़कों को समान रूप से सिखाना चाहिए। खाना बनाना लड़कों को भी आना चाहिए। कामकाजी पति-पत्नी के घर में दोनों ही लगभग सभी काम करते हैं। ये सब बच्चों को स्कूल में सिखाया जाना चाहिए। कुछ व्यावहारिक प्रयोगों द्वारा और कुछ विडियो दिखाकर।

 

यह तो ठीक है कि हम बच्चों को महान व्यक्तियों के बारे में बताकर उन्हें अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करते हैं लेकिन बच्चों को यह भी बताना चाहिए कि छोटे बच्चे घर के कामों में अपनी माता-पिता की मदद करके भी महान बनते हैं। उनको पता होना चाहिए कि यदि वे काम पर जाने से पहले अपने पिता की साइकिल-बाइक-कार को पोंछ देंगे तो यह कितना बड़ा काम होगा। रसोई में मां का हाथ बटाएँगे तो उनके द्वारा किया काम कितना महत्वपूर्ण होगा।

 

ज़रूरत तो इस बात की है कि प्रत्येक स्कूल, कॉलेज में कुछ विषय अलग से पढ़ाए जाने चाहिए। जिनसे छात्राओं और छात्रों को अच्छा इंसान बनने में मदद मिले। ‘संस्कृति’ एक अलग विषय होना चाहिए और इस विषय के अधीन सब-कुछ सिखाना चाहिए।

धन्यवाद

आपका पथ-प्रदर्शक 

धर्मेन्द्र कुमार 

पुस्त्कायाध्यक्ष 



Annual Panel Inspection

                                                Annual Panel Inspection

PM SHRI Kendriya Vidyalaya Janakpuri 

1st & 2nd Shift
on 23.11.2023

On 23.11.2022 ( Thursday) the Annual Panel Inspection of PM SHRI KV Janakpuri is going to be held by the galaxy of intellectuals. Through the Annual Inspection, we learn many new things with the help of suggestions given by the observers. This inspection is different from the last three years' inspections as the teaching-learning has gone Online because of COVID-19. That was a challenge for the teachers and the Taught. 

Now Again We are offline and the Annual panel Inspection is offline.

"It is a time to inspire and to be inspired"

Kendriya Vidyalaya Janakpuri Delhi 2nd Shift welcomes respected Asst. Commissioner Mr. K C Meena and all the inspecting team members will inspect our Vidyalaya under her great supervision. Details of the Inspecting teams are:

Sr. No.    Name of the members of                 Designation & Name of KV    

                      Inspecting Team-

  1. NAME DESIGNATION & SCHOOL NAME
    1. Sh. V. K Yadav   Principal, KV Chhabala
    2. Sh Haripad Das      Principal, KV Rangpuri
    3. Smt Rashmi Shukla
    4. Sh Navendu Parasar
           Principal, KV SPG Dwarka
        Principal KV Tughalakabad
    5. Sh. Shiva Kr. Sharma         Principal KV 4 Delhi Cantt
    6. Smt poonam SaloojaPrincipal KV Rohini Sec - 8
    7. Mr Pawan Sharma        VP, KV Vigyan Vihar Shift - 2
    8. Smt Anjalina BaddingHM  KV BSF Chhawala Cantt
    9. Sh Sujit Kumar    HM, KV INA
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शीर्ष 30 मनोवैज्ञानिक जीवन हैक्स

 

TOP 30 PSYCHOLOGICAL LIFE HACKS

1.मुस्कुराहट: मुस्कुराहट हमारे इम्यून सिस्टम को पुष्ट करती है, और औसत से 7 साल ज्यादा समय तक जीने में हमारी मदद कर सकती है। हंसते हुए लोग दिन में 40-50 बार मुस्कुराते हैं, और औसत इंसान दिन में केवल 20 बार मुस्कुराते हैं। इसलिए मुस्कुराते रहिए।

2.अपने आप से बातें करें: दिन में एक बार अपने आप से बात करें। अन्यथा आप दुनिया के एक उत्कृष्ट व्यक्ति से मिलने से चूक सकते हैं।

3. जब आप किसी को गले लगाते हैं या किसी के साथ हाथ मिलाते हैं तो यह आपका मूड बदल देता है। यह आपको अच्छा और खुश महसूस कराता है। इसलिए अपने प्रिय जनों को गले लगाओ और उनसे गले लगो।

4. अच्छी तस्वीरें देखें: एक अध्ययन में दावा किया गया है कि, कोई भी जानवर की एक सुंदर तस्वीर देखने से आपकी प्रोडक्टिविटी बढ़ जाता है।

5. धीरे-धीरे भोजन करें: धीरे-धीरे भोजन खाने से आपका वजन कम होता है। इससे आपको भोजन का आनंद भी मिलता है और आपका तनाव भी कम होता है। धीरे-धीरे भोजन करने से आपके पाचन शक्ति को भी मदद मिलती है।

6.नएं और खुले स्थान में चलें: नएँ एवं खुले स्थानों पर चलना आपके मस्तिष्क को एक नए विचारों को तेजी से सोचने और रचनात्मक बनाने में मदद करता है।

7. स्वस्थ भोजन करें: स्वस्थ भोजन करना खुश रहने की उत्तम उपाय हैं। स्वस्थ आहार वास्तव में आपकी शरीर और आत्मा को उत्थान कर सकता है, और आपकी माइंड Healthy बनाता है। फल और सब्जियां खाने वाले लोग अधिक संतुष्ट और खुशहाल जीवन जीते हैं।

8. स्मार्टफोन का कम उपयोग करें: जितना हो सके अपने मोबाइल का कम उपयोग करें। एक सर्वेक्षण में कहा गया है की, जो व्यक्ति मोबाइल का आधी प्रयोग करता है, वे औसतन व्यक्ति से 90% ज्यादा तनाव और निराशा का सामना करता है।

9. अच्छे आदतें बनाएं: अच्छी आदतें बनाएं। आदते बदलने से आपका जीवन बदल जाएगा। आप अपना भविष्य तों नहीं बदल सकते हैं, लेकिन आप अपनी आदतें बिल्कुल बदल सकते हैं और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपके भविष्य को बदल देगी।

10. आत्मविश्वास रखें: बस आप यह विश्वास करें कि आप वास्तव में बेहतर है। आप अगले दिन संज्ञानात्मक प्रदर्शन को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त है। आपके स्वास्थ्य को दिन प्रतिदिन के जीवन में सुधार लाएगा।

11. दोस्तों से बेझिझक बातें करें: बातें करना वास्तव में दो लोगों के बीच के संबंध को मजबूत करता है, यह दोस्ती को मजबूत बनाता है। इसलिए जितना संभव हो उतना वार्तालाप करें और अपने रहस्य को अपने नजदीकी लोगों के साथ साझा करें।

12. दूसरों कों हँसाने कि कोशिश करें: जब आप दूसरों को हंसाते हैं, तो आप दूसरे व्यक्ति के लिए अधिक आकर्षक दिखाई देते हैं। एक अच्छा भावनाएं आपके लिए पूरे जीवन में अन्य लोगों के साथ बातचीत करने के लिए उपयोगी होता है।

13. किसी कों भी उसके नाम से बुलाएं: एक अध्ययन का कहना है कि : जब आप किसी से मिलते हैं तो उन्हें उनके नाम से बुलाए। लोग उनके नाम सुनना पसंद करते हैं। इससे वह आप में अधिक रुचि दिखाएंगे।

14. दूसरों कि तारीफ और सम्मान करें: जब आप किसी व्यक्ति को खुद से प्यार करने में प्रेरित करते हैं, तो वे आपके प्यार में पड़ जाएंगे। उन पर विश्वास और प्रेरणा जगाए, उनके मार्गदर्शक या शुभचिंतक बने रहे। वह व्यक्ति के अंदर स्वतः ही मनोविज्ञान के द्वारा आपके प्रति एक मजबूत है स्नेह भर देगा।

15. अच्छे जूते पहनें: आपके जूते आपके विचार से बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरे लोग आपके जूते देखकर ही आपके बारे में निष्कर्ष निकालते हैं। इसलिए जितना हो सके अच्छे जूते पहनना कीजिए।

16. नई-नई जगह कि यात्रा करें: यात्रा मस्तिष्क की गतिविधि को बढ़ाती है और डिप्रेशन को कम करती है। इसलिए स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए नई-नई स्थानों पर यात्रा कर सकते हैं।

17. पर्याप्त नींद ले: दैनिक कम से कम 7 घंटे की नींद ले। अच्छी नींद आपकी प्रोडक्टिविटी को बढ़ाती है और आपकी यादों को मजबूत बनाती है। जो आपके शरीर से तनाव और दर्द को दूर करती है और बेहतर जीवन को जीने के लिए चिंता और डिप्रेशन को कम करती है।

18. किसी भी तनाब कों कम करने के लिए डायरी में लिखें।: यदि आप किसी विचार के कारण आप रात भर सो नहीं पा रहे हैं, तो उठकर इस विचारों को एक कागज में लिखें। इससे आपका तनाव दूर होगा और आप अच्छी नींद ले सकते हैं।

19. अपनी जीवन के लक्ष्य कों गुप्त रखें: अपनी लक्ष्य कों यदि आप अपने लक्ष्य के बारे में किसी और को बताते हैं, तो आपकी लक्ष्य प्राप्त करने की संभावना कम हो जाती है। इसलिए अपने लक्ष्य को गुप्त रखें, और अपने लक्ष्य प्राप्ति करने के लिए कड़ी मेहनत करें।

20. साइकोलॉजी के अनुसार अच्छे संबंध एक्सरसाइज की तुलना में आपके स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि किसी व्यक्ति के सामाजिक संबंध का आकार और गुणवत्ता उनके जीवन के विभिन्न बिंदुओं पर पेट के मोटापे और उच्च रक्तचाप जैसे स्वास्थ्य उपाय को प्रभावित करती है।

21. तनाव से बचें।: तनाव शरीर के वजन और घुलनशील उत्पादन,साथ ही शर्करा फैटी खाद्य पदार्थों और भूख के लिए Cravings से जुड़ा हुआ है।

22. संगीत सुनने से एथलीटों या जॉगर्स को अधिक चलने में मदद मिलती है।

23. साइकोलॉजी टुडे में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार संगीत, ग्रे पदार्थों पर विकास को बढ़ावा देने में मदद करता है।

24. सदा हंसमुख रहें: बच्चे आसानी से और अक्सर हंसते रहते हैं। लेकिन व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में हंसी के लिए समय निकालना ही भूल जाते हैं। हंसी हमारी इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है, हमारे विचार में परिपक्वता लाता है, तनाव को कम करता है, अच्छी नींद लाता है और हमारे जीवन में ढेर सारी खुशियां भी लाते हैं।

25. गलतियां हमेशा बुरी नहीं होती है। वास्तव में गलतियां करना आपके अनुभव को जोड़ता है और आप उन्हें फिर से दोहराना नहीं सीखते हैं। सफलता अनुभव से हासिल होता है, और अनुभव बुरे अनुभव से प्राप्त होता है।

26. अनपेक्षित सुदृढ़ीकरण कार्य सर्वश्रेष्ठ होता है। पुरस्कार अप्रत्याशित होता है। अच्छे प्रदर्शन का अच्छे नतीजे मिलना हमेशा ज्यादा संभावना होता हैं।

27. नियमित रूप से ब्रेक लेना हमें और ज्यादा जानने में मदद करता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार : कुछ भौतिक चीजे को याद रखने की कोशिश करते समय नियमित रूप से ब्रेक लेना हमें और तेजी से और अधिक कुशलता पूर्वक करने में मदद करता है।

28. औसतन हमें किसी भी विशेष आदतों को बनाने में 66 दिन का समय लगता है। यह आदतें अच्छा या बुरा भी हो सकता है। अच्छी आदतों के निर्माण के दौरान हार न माने। यह आसानी से बन जाएगा इसे नियमित रूप से करें।

29. यहां तक की प्रगति का विचार भी हमें प्रेरित करता है। जब कुछ विचार या प्रगति की संभावना होती है तो हम कोशिश करते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं। यदि आपके अपने जीवन में सफल होना है तो अपने जीवन में बेकार या मुफ्त बैठो।

30. ईर्ष्या खराब मानसिकता की उपज हैं। ईर्ष्या को अपनी भावनाओं पर हावी होने न दे। अपने आप से सवाल करें की आपको ऐसा क्यों लगता हैं? अपने स्वम् के लक्ष्य पर काम करना सबसे अच्छा होता हैं।

Study Material

 

PRIMARY WORKSHEET CLASS 3 TO 5 by ZIET Chandigarh

 PRIMARY WORKSHEET FOR ALL SUBJECTS 

   CLASS 3

          CLASS 4 

          CLASS 5


 courtesy:https://libraryzietchd.blogspot.com/

Study Material 2022-23 by Zeit Chandigarh

 Study Material 2022-23

CLASS 12










CLASS 10






CLASS 6


CLASS 7


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Prayas

                                                             

Year - 2                            Month - September 2022                Issue - 34 

प्यारे बच्चों,

क्या हुआ,

मिल गया धोखा अब मिल गयी शान्ति जिस चीज़ के लिए, जिस इंसान के लिए अपनी पढाई, लिखायी अपनी सारी मेनहत माँ-बाप, भाई-बहन सब कुछ त्याग दिए. उसी इंसान ने तुम्हारी ज़िंदगी को बर्बाद कर दिया शुरु-शुरु में बहुत सपने देखे की साथ मिलकर ये करंगे वो करेंगे ऐसा कर डालेंगे वैसा कर डालेंगे लेकिन अब क्या हुआ वो सारे सपने, कहाँ गए वो सारे दोस्त.

ज़िन्दगी में हमेसा एक बात याद रखना यदि तुम अपने लक्ष्य को प्यार करोगे तो ये पूरी दुनिया तुमसे प्यार करेगी लेकिन तुम मूर्खो की तरह एक इंसान के चक्कर में पड़कर अपने लक्ष्य को भूल जाओगे उसके लिए मेनहत करना भूल जाओगे तो फिर वो तुम्हे अपनी औकात याद दिलाएगा.

बहुत प्रेम किया था न तुमने उससे बहुत इज्जत दी थी न तुमने उसको अब कहाँ क्या वो प्रेम अब कहाँ गयी वो इज्जत यदि वो प्रेम वो इज्जत अपने लक्ष्य को दी होती ना तो आज पूरी दुनिया तुम्हारे पीछे भाग रही होती.

लेकिन किसी के कितने समझाने के बाद भी तुम कहा समझ पाए तुम अपनी मूर्खता में लगे रहे और सिर्फ वही काम करते रहे जो तुम्हे अच्छा लग रहा था.

लेकिन जो सच था आज तुम्हारे सामने है और तुम परेशान हो रहे हो, चीख रहे हो, चिल्ला रहे हो, रो रहे हो, टेंसन ले रहे हो, की अब हमारी ज़िंदगी का क्या होगा अरे चीखने चिल्लाने परेशान होने से किसी की ज़िंदगी में कुछ नहीं बदलता यदि बदलता है तो वो बदलता है अपने फैसलों से आपसे जो गलतियां हुयी है उनको सुधारने के फैसलों से.

लेकिन आज के बाद यदि फिर से वही गलतियां करते रहोगे फिर वही मूर्खता करते रहोगे तो आपकी ज़िंदगी में फिर से वही समय आने वाला है जो आज आया है और आप अपने पूरी ज़िंदगी को इन्ही चक्क्रों में पड़कर बर्बाद कर लोगे.

आज तुम्हारे पास दो रास्ते है या तो उसी रास्ते पे वापस जाओ जहा तुम्हारी ज़िंदगी बिगड़ने वाली है और अभी तक बिगड़ चुकी है, और दूसरा रास्ता तुम्हे ले जाता है अपनी मंजिल की ओर वो मंजिल जहां तुम खुद अपने आप को देखना चाहते हो तुम्हारे माता-पिता तुम्हारा समाज तुम्हरे भाई-बहन सभी तुम्हे वहां पंहुचा हुआ देखना चाहते है लेकिन तुम खुद उसे बर्बाद कर रहे हो.

यही वो समय है जब तुम अपनी ज़िंदगी को बदल सकते हो और फैसला ले सकते हो एक फैसला जो तुम्हारी पूरी को पूरी ज़िंदगी बदल कर रख देगा और नहीं तो वापस मुड़ जाओ उसी रास्ते पर, उस कीचड़ में, उस दलदल में जहां से फंस के ज़िंदगी का कोई भी इंसान वापस नहीं निकल पाया.

अरे सोच क्या रहे हो,

उस बत्तर सी ज़िंदगी से निकलो अपने आप को निकालो ये टेंशन लेना बंद करो ये सोचना और समझना बंद करो और अपनी काम की ओर अपनी लक्ष्य की ओर ध्यान लगाओ मेनहत करो और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ो.

आज के बाद उसे याद करने की जरूरत नहीं है जिसने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी बल्कि उसे दिखाने की जरूरत है की तुम बर्बाद नहीं हुए हो.

वो जो सोच भी नहीं सकते तुम उसे करने के लिए तैयार हो चुके हो, और वो तुम अब बन के दिखाओगे वो कर के दिखाओगे जो ये दुनिया सोच भी नहीं सकती,

तो अब उठो,

अपने आपको इन सारे के सारे चक्करो से निकालो और पढाई करने के लिए बैठ जाओ तो किसी भी चीज़ के लिए रोना-धोना बंद करो, टेंशन लेना बंद करो और पढाई में अपना पूरा ध्यान लगाओ.

धन्यवाद

तुम्हारा  पथ-प्रदर्शक 

धर्मेन्द्र कुमार 

पुस्त्कायाध्यक्ष 

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